Thursday, 16 July 2026

तसल्ली

 

 

तसल्ली

​उम्र दराज़ों से बाहर निकल आई है,

किनारे बालों के चांदी जगमगाई है।

​सजते-संवरते थे कभी जिस आईने में हम,

आज देखा तो एक झुर्री नज़र आई है।

​ग़लतियों के कई टुकड़े गवाह, मेरी हार के,

जोड़कर जिन्हें हमने, समझ अपनी बढ़ाई है।

​छोटी कोशिशों ने बड़ा तजुर्बा दिया हमें,

शांत रहकर भी जीती हर लड़ाई है।

​रफ़्तार ज़िन्दगी की कुछ थम सी गई,

तसल्ली कोने में बैठी मुस्कुराई है।

​सफ़र की दोपहर ही ढली है अभी 'गौरव',

ख़ूबसूरत शाम की बाक़ी, मुंहदिखाई है। ✍️गौरव

 

17.07.2026 

11.45 am

भोपाल 

Thursday, 4 June 2026

भोपाल


   भोपाल

वो सुकून, वो राहत  

अब नज़र नहीं आती,  

वो ठहराव, वो ताज़गी  

अब नज़र नहीं आती।  

जिनसे मिलती थीं सांसें   

ज़िन्दगी को,

वो हवा, वो हरियाली  

अब नज़र नहीं आती।  

  

वो झील के किनारे की शामें,  

जो ख़ामोश-सी मुस्काती थीं,  

साँसों में घुल जाती थी जो,  

वो ख़ुशबू अब नज़र नहीं आती।  

  

कंक्रीट के जंगलों में  

खो गई कतार पेड़ों की,  

हर पल जो करती थी रखवाली,  

वो प्रकृति अब नज़र नहीं आती।  

  

अंधाधुंध विकास की दौड़ में  

वो अनमोल भोपाल खो गया,  

जिस पर था कभी गुमान,  

अब वो ख़ुशहाली नज़र नहीं आती।  

  

झीलों का शहर तो आज भी है,  

मगर वो बात पुरानी  

नज़र नहीं आती,  

दिल ढूँढ़ता है जिस भोपाल को,  

अब उसकी कोई निशानी  

नज़र नहीं आती।

✍️गौरव 

05.06.2026

10.30.am

Monday, 30 March 2026

लड़को वाली बात

 

लड़को वाली बात


अब वो आशिक़ी नहीं रही,

अब वो आवारगी नहीं रही,

तुझे देखने की हसरत में

फिरते थे मारे-मारे,

अब वो पागलपन,

वो दीवानगी नहीं रही।


तज़ुर्बा हो गया है अब,

दूर रहकर भी रिश्ते

निभा लेता हूँ मैं।

हंसता भी हूँ, हंसाता भी हूँ,

टूटे दिल के साथ भी

खुद को संभाल लेता हूँ मैं।


अब वो खाम-ख्याली नहीं रही,

तसव्वुर में भी हकीकत यही रही,

फ़र्ज़ों ने गढ़ दिया

एक नया शख्स मुझमें,

अब मुझमें वो

लड़कों वाली बात नहीं रही। ✍️गौरव

Saturday, 7 March 2026

मुसाफ़िर की तलाश

                                 मुसाफ़िर की तलाश

मुखड़ा (Hook)

कहीं मिले खुशियाँ तो लेते आना,

कहीं मिले सुकून तो लेते आना।

थक गया हूँ ज़िंदगी के मसलों से,

कहीं मिले नींद… तो लेते आना।।

Verse 1

अब इस सफ़र का कोई ठौर नहीं दिखता,

मेरी उलझनों का कोई छोर नहीं दिखता।

जाने कहाँ से रोज़ सवाल चले आते हैं,

जवाबों के सिवा कुछ और नहीं दिखता।।

कभी करो सफ़र तो इधर से गुज़रना,

कभी मिले वक़्त तो दो पल ठहरना।

राह-ए-तन्हाई के इस अँधेरे मोड़ पर,

कहीं मिले भोर… तो लेते आना।।

Verse 2

करता हूँ तलाश… फिर भी कोई नहीं मिलता,

दे ज़िंदगी में साथ… ऐसा कोई नहीं मिलता।

मिलते तो बहुत हैं ग़म बाँटने मुझसे,

पर मेरा ग़म बाँट ले… ऐसा कोई नहीं मिलता।।

कभी मिले फुर्सत… तो ग़म बाँटते जाना,

मेरे चेहरे की हर शिकन मिटाते जाना।

फिर चल पड़ूँ मैं बनकर कारवाँ ज़माने में,

बस इतनी सी उम्मीद… मुझे दिलाते जाना।।

Bridge

बहुत शोर है दुनिया की राहों में,

कहीं मिले ख़ामोशी… तो लेते आना।

खो गया हूँ भीड़ में खुद को खोजते खोजते,

कहीं मिल जाए तुम्हें गौरव… तो लेते आना।।

Final Hook

कहीं मिले खुशियाँ तो लेते आना,

कहीं मिले सुकून तो लेते आना।

थक गया हूँ ज़िंदगी के मसलों से,

कहीं मिले नींद… तो लेते आना।।✍️गौरव

07.3.26

10.50 PM


Monday, 9 February 2026

पढ़ो तुम, बढ़ो तुम...

 पढ़ो तुम, बढ़ो तुम


पढ़ो तुम, बढ़ो तुम

दूर गगन में उड़ो तुम

मेहनत के पंख लगाकर

आसमाँ पर चढ़ो तुम

पढ़ो तुम, बढ़ो तुम

आसमाँ पर चढ़ो तुम


सागर में विज्ञान के

तैरो गोता लगाओ तुम

ज्ञान के प्रकाश से

अज्ञानता को हरो तुम

पढ़ो तुम, बढ़ो तुम

आसमाँ पर चढ़ो तुम


अपनी रुचियों से हरी-भरी

ऐसी दुनिया चुनो तुम

कला के संसार में

फूल जैसे खिलो तुम

खेल के मैदान में

चौके छक्के जड़ो तुम

पढ़ो तुम, बढ़ो तुम

आसमाँ पर चढ़ो तुम


मौके ऐसे भी आएँगे

सब आगे निकल जाएँगे

विश्वास स्वयं पर दृढ़ रखना

परिणाम से मत डरो तुम

पढ़ो तुम, बढ़ो तुम

दूर गगन में उड़ो तुम

मेहनत के पंख लगाकर

आसमाँ पर चढ़ो तुम

पढ़ो तुम, बढ़ो तुम

आसमाँ पर चढ़ो तुम...

✍️गौरव

10.2.26

Friday, 26 September 2025

झोंका ए हवा

 झोंका-ए-हवा


जब भी छूता है कोई झोंका-ए-हवा तन को,

तेरी मौजूदगी का होता है, एहसास मुझे।


तू तो मौसम की तरह रंग बदल जाता है,

फिर भी माना है मैंने मेरा, आसमान तुझे।


मेरी आँखों में ठहरे लम्हे, मुलाक़ातों के,

मेरे हर ग़म से वही देते हैं, निज़ात मुझे।


तेरी नाराज़गी की हर वजह मिटा दूँगा,

तू जो लौटे तो बता दूं मेरे ज़ज्बात तुझे।


तेरी यादों में, एक खुशनुमा सी ताज़गी है,

उम्र भर देती है जीने की जो सौग़ात मुझे।

✍️गौरव

26.09.2025

ज़िन्दगी

 ए ज़िन्दगी अब तुझमें वो बात नही रही

अब पहले जैसी वो तरबियात नहीं रही

वो हक़ के लिए लड़ाना,

सीखना सिखाना

संघर्ष की ज़मीन पर

गिराना चलाना

सपने दिखाकर

मेहनत कराना

थकाना और थकाकर

पल भर सहलाना

अब तुझमे वो सारी

खुराफ़ात नही रही

पहले जैसी अब तू

तुनकमिजाज नही रही

ए ज़िन्दगी अब तुझमे

वो बात नही रही।।

✍️गौरव

20.09.2025