भोपाल
वो सुकून, वो राहत
अब नज़र नहीं आती,
वो ठहराव, वो ताज़गी
अब नज़र नहीं आती।
जिनसे मिलती थीं सांसें
ज़िन्दगी को,
वो हवा, वो हरियाली
अब नज़र नहीं आती।
वो झील के किनारे की शामें,
जो ख़ामोश-सी मुस्काती थीं,
साँसों में घुल जाती थी जो,
वो ख़ुशबू अब नज़र नहीं आती।
कंक्रीट के जंगलों में
खो गई कतार पेड़ों की,
हर पल जो करती थी रखवाली,
वो प्रकृति अब नज़र नहीं आती।
अंधाधुंध विकास की दौड़ में
वो अनमोल भोपाल खो गया,
जिस पर था कभी गुमान,
अब वो ख़ुशहाली नज़र नहीं आती।
झीलों का शहर तो आज भी है,
मगर वो बात पुरानी
नज़र नहीं आती,
दिल ढूँढ़ता है जिस भोपाल को,
अब उसकी कोई निशानी
नज़र नहीं आती।
✍️गौरव
05.06.2026
10.30.am
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