तसल्ली
उम्र दराज़ों से बाहर निकल आई है,
किनारे बालों के चांदी जगमगाई है।
सजते-संवरते थे कभी जिस आईने में हम,
आज देखा तो एक झुर्री नज़र आई है।
ग़लतियों के कई टुकड़े गवाह, मेरी हार के,
जोड़कर जिन्हें हमने, समझ अपनी बढ़ाई है।
छोटी कोशिशों ने बड़ा तजुर्बा दिया हमें,
शांत रहकर भी जीती हर लड़ाई है।
रफ़्तार ज़िन्दगी की कुछ थम सी गई,
तसल्ली कोने में बैठी मुस्कुराई है।
सफ़र की दोपहर ही ढली है अभी 'गौरव',
ख़ूबसूरत शाम की बाक़ी, मुंहदिखाई है। ✍️गौरव
17.07.2026
11.45 am
भोपाल
No comments:
Post a Comment