Thursday, 16 July 2026

तसल्ली

 

 

तसल्ली

​उम्र दराज़ों से बाहर निकल आई है,

किनारे बालों के चांदी जगमगाई है।

​सजते-संवरते थे कभी जिस आईने में हम,

आज देखा तो एक झुर्री नज़र आई है।

​ग़लतियों के कई टुकड़े गवाह, मेरी हार के,

जोड़कर जिन्हें हमने, समझ अपनी बढ़ाई है।

​छोटी कोशिशों ने बड़ा तजुर्बा दिया हमें,

शांत रहकर भी जीती हर लड़ाई है।

​रफ़्तार ज़िन्दगी की कुछ थम सी गई,

तसल्ली कोने में बैठी मुस्कुराई है।

​सफ़र की दोपहर ही ढली है अभी 'गौरव',

ख़ूबसूरत शाम की बाक़ी, मुंहदिखाई है। ✍️गौरव

 

17.07.2026 

11.45 am

भोपाल