मुसाफ़िर की तलाश
मुखड़ा (Hook)
कहीं मिले खुशियाँ तो लेते आना,
कहीं मिले सुकून तो लेते आना।
थक गया हूँ ज़िंदगी के मसलों से,
कहीं मिले नींद… तो लेते आना।।
Verse 1
अब इस सफ़र का कोई ठौर नहीं दिखता,
मेरी उलझनों का कोई छोर नहीं दिखता।
जाने कहाँ से रोज़ सवाल चले आते हैं,
जवाबों के सिवा कुछ और नहीं दिखता।।
कभी करो सफ़र तो इधर से गुज़रना,
कभी मिले वक़्त तो दो पल ठहरना।
राह-ए-तन्हाई के इस अँधेरे मोड़ पर,
कहीं मिले भोर… तो लेते आना।।
Verse 2
करता हूँ तलाश… फिर भी कोई नहीं मिलता,
दे ज़िंदगी में साथ… ऐसा कोई नहीं मिलता।
मिलते तो बहुत हैं ग़म बाँटने मुझसे,
पर मेरा ग़म बाँट ले… ऐसा कोई नहीं मिलता।।
कभी मिले फुर्सत… तो ग़म बाँटते जाना,
मेरे चेहरे की हर शिकन मिटाते जाना।
फिर चल पड़ूँ मैं बनकर कारवाँ ज़माने में,
बस इतनी सी उम्मीद… मुझे दिलाते जाना।।
Bridge
बहुत शोर है दुनिया की राहों में,
कहीं मिले ख़ामोशी… तो लेते आना।
खो गया हूँ भीड़ में खुद को खोजते खोजते,
कहीं मिल जाए तुम्हें गौरव… तो लेते आना।।
Final Hook
कहीं मिले खुशियाँ तो लेते आना,
कहीं मिले सुकून तो लेते आना।
थक गया हूँ ज़िंदगी के मसलों से,
कहीं मिले नींद… तो लेते आना।।✍️गौरव
07.3.26
10.50 PM